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کنار پیچ خیابان زنی که ناباور
نشسته.سفره ی شعرش پر از هوای سفر
و یک غزل که به آخر رسید و شد بن بست
شبیه کوچه ی بیمار،کور،لال و کر
عروسک نگه اش در پی نگاهی ناب
و روزهای قشنگی که بود ابری و تر
و زن که خسته نگاهش به سفره می افتد
که خالی است ندارد درون خود دیگر
نه شور و شوق غزل نه هوای شعری نو
تهی ست از تب شعری که خوانده در دفتر
هنوز هم به زمین شاعرانه می نگرد
همان دو بیت قشنگش که مانده بی یاور
و حال اخر شعرم دوباره زنده شده
غبار خاطره های کبود یک مادر
چقدر لحظه ی نابی ست ناگهان یک زن
کنار مرگ خودش میپرد از این دفتر
و حال صفحه ی اخر،زنی که می میرد
و سفره ای که تهی بود در تمام سفر