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عنوان بحثمشاعره 5 بهمن 85 - 02:34 | |
فکر نمی کنم نیازی به توضیح باشه... | |
ترتیب پاسخ ها :
از اولین پاسخ
394 5 مرداد 1387 ساعت 18:42 | |
روز و شب خوابم نمیآید به چشم غم پرست بس که در بیماری هجر تو گریانم چو شمع |
393 4 مرداد 1387 ساعت 22:16 | |
در محضر دوست هر که بی جان و سر است از باده وصل او شود بر خوردار
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392 4 مرداد 1387 ساعت 18:53 | |
ز بعد خاک شدن یا زیان بود یا سود به نفد خاک شوم بنگرم چه خواهد بود |
391 4 مرداد 1387 ساعت 15:44 | |
طهارت ار نه به خون جگر کند عاشق
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390 3 مرداد 1387 ساعت 11:39 | |
مگر چون به آن شربت آرم نشاط غمی چند را در نوردم بساط ساقینامه نظامی |
389 3 مرداد 1387 ساعت 01:49 | |
نه مرا طاقت غربت نه تو را خاطر قربت دل نهادم به صبوری که جز این چاره ندانم |
388 31 تیر 1387 ساعت 12:42 | |
در زبان او بباید آمدن تا بیاموزد ز تو او علم و فن
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387 31 تیر 1387 ساعت 08:22 | |
تو را ای بهترین مصراع خوشبختی خدایانت كدامین شب به این تنهاترین مرد جهان دادند |
386 31 تیر 1387 ساعت 00:48 | |
تا چه بازی رخ نماید بیدقی خواهیم راند عرصه شطرنج رندان را مجال شاه نیست |
385 26 تیر 1387 ساعت 18:00 | |
در او راز دل گلها شکفته است که تا اکنون کسی دیگر نگفته است
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384 24 تیر 1387 ساعت 13:50 | |
دل ز من بردی و پرسیدی که دل گم کردهای این چنین طراریت با من مسلم کی شود |
383 22 تیر 1387 ساعت 11:27 | |
زان پیش که بر سرت شبیخون آرند فرمای که تا باده گلگون آرند
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382 22 تیر 1387 ساعت 11:21 | |
در سنبلش آویختم از روی نیاز گفتم من سودا زده را کار بساز گفتا که لبم بگیر و زلفم بگذار در عیش خوش آویز نه در عمر دراز |
381 22 تیر 1387 ساعت 10:22 | |
دردم نهفته به ز طبیبان مدعی باشد که از خزانه غیبم دوا کنند |
380 22 تیر 1387 ساعت 10:10 | |
من تشنهکام ساغر آن بادهام کز جرعهای ویران کند، دوباره بسازد |














