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11 شهریور 1385 |
نگار ماندگار - 07:30 1385/06/11
رباعی
ای غم ، تو که هستی از کجا می آیی؟
هر دم به هوای دل ما می آیی
باز آی و قدم به روی چشمم بگذار
چون اشک به چشمم آشنا می آیی!


